Thursday, February 2, 2012

The role of Maithil and Mithila in the promotion and growth of Jharkhand,"

The role of Maithil and Mithila in the promotion and growth of Jharkhand," is a widely discussed topic in Jharkhand while we are doing agitation for the second language status of Maihtili in Jharkhand on several grounds.

Maithili is the language of Devghar, and around of Santhal Pragana as per the Linguistic Survey done by George Griesrson and it has been accepted by the Patna High Court as well in its decision.

Maithils have been always in favour of Jharkhand- in 1992 when Babu Saheb Choudhary came Ranchi and I organised his meetings our support to Jharkhand movement had appeared in the Ranchi express(I have that news cutting even now).

Maithils have contributed a lot in all spheres of Jharkhand- its movement and development on which we are planning a seminar in the near future.

It has been said that the first martyr for the Jharkhand movement was led by NokheLal Mishra of Jamshedpur who went to jail demanding Jharkhand..

DR. JC Jha had his thesis on tribal movement before Birsa Munda from the London University which is probably first thesis on the tribal life of Jharkhand.

There is hardly any good school/college of repute or University where Maithils had not taught and in a way the educational world of Jharkhand is in debt of Maithils.

I witnessed in one Vidyapati Parva at Muri Sudesh Mahto local MLA and now deputy CM, Jharkhand had come late and on the dais he caught his ears before Anil Mishra of Damodarpur, Madhubani saying,'Sir, I was always late in your class and again today I am late, please excuse me."
Surprisingly his party MLAs at Ramgargh(Chandra prakash Choiudhary )and Chandankiyari (Umakant Rajak) had opposed Maithili in Vidhan Sabha for second language.
At Chandankiyari whole village is Maithili speaking for some 250 years called Satgharia Maithils and I had been there on 2.12.2007 with Tulababu, Ardhnareeshwar met old Sushil Jha who told us that for the first time they were visited by any Maihtil since they left Mithila and settled there. He informed us that Shaligram is since then is daily worshipped with Bhog in their house.
Near Bahragoda many Maihtils families are settled –once a MLA of CPI lady some Sharma was a Maithili Likewise near Daltonganj a village Kishanpura is settled by Maithil Brahmins.
These areas are on the way of Babaidyanath dham to Jagannathpuri and Maithils are settled in between.
Whole Santhal Pargana is Maithil dominated- Motoa Dumaria is called Koilakh of Godda district and Godda district is called Mithilanchal of Santhal pargana.
Hemant kumar Jha was other MLA and many other like Shudhhadev utpal, Budhhinath Jha ‘Kairav’ and in fact any staltwart from Santhal Pargana has been a Maithil and many among them were non-Brahmins also.
Present Governor MP HE Rameshwar Thakur hails from santhal pargana and is a Maithil Brahmin.
The word ‘Angika,’ can be better said as Dakshini Maithili a soer my own views.
Dr. Jaikant Mishra had retorted at the Budhanath Temple, Bhagalpur,’Are you call yourselves as Angika Brahmin? And everybody was mollified.
The area south of Ganga till Jamtara is an extension of Maithila is historically proved.
From Deoghar Vinodanad Jha was a member of the Constituent Assembly who became second chief minister of undivided Bihar.
From Deoghar Bhavpreetanand was agreat Maithili poet on which Sahitya Akademy has published a monograph.
Maithili is taught in colleges of Jharkhand since 1960s and the first recipient of Sahitya Akademy award since the formation of Jharkhand was in Maithili(Vivekanand Thakur) and the present representative of Maithiulki in Sahitya Akademy is Dr. Vidya Nath Jha ‘Vidit’ who taught maithili at the S>P College, Dumka and is famous for his book on “Maithili and Santhali- Sambandh o Saaampya.’
In fact Nagpuria is closest resembling to Maithili spoken in Ranchi mofussil.
It was said by any Dr. Guneshwar Jha , ex-Dean Faculty SDcience, ranchi University and president, Antarrashtriy maithili parishad, Jharkhand, in a speech that our Maithils not only spread education in Jharkhand they also sold salt to the interiors.
In industrial field , Maithils have been contributing in every central and or state PSUs- they are the brain and labour of any such industry and many have been CMDs/CEOs in CIL, SAIL etc
Now Maihtils are in every sphere of Jharkhand from a peon to the Chief secretary of Jharkhand Mr. SK Choudhary and so as a group we are those who had contributed to the life of Jharkhand.
Not only my uncle Kshemkar Thakur was a headmaster of Rungta HE School, Chibasa for many years I have met many Jharkhandi persons in the train who owed to some or other Maithil teacher.
I personally came here in 1970 as a student and during Durgapuja of 1980 had been to village Anjan(where Lord Hanuman was said to be born to Mother Anjana) with a medicos team and was the first doctor to go to the tribe of Asurs and Korbas knowing which Gandhian Subba Rao congratulated me at Raipur during October 26-28,1980 in the ABVP conference(he had this information from some source that I had visited there sometimes back).
Dr. Dhanakar Thakur


Badal chandra mahato said...

बंगला और ओडिया को निश्चित रूप से झारखण्ड की द्वितीय राजभाषा बनाना चाहिए परन्तु दुर्भाग्य की बात है की सन २००७ में मधु कोड़ा सरकार ने बंगला को छोड़कर उर्दू को द्वितीय राजभाषा बना दिया गया .
झारखण्ड में द्वितीय भाषा के रूप में बंगला का ओडिया का विरोध -
झारखण्ड में कुछ संगठन बंगला और ओडिया जो द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने का विरोध कर रहे है . उनका तर्क है की ये गैर झारखंडी भाषा है . क्या बंगला और ओडिया का विरोध करने वाले झारखंडी संगठन मुझे ये बताने का कष्ट करंगे की क्या उर्दू और हिंदी क्या झारखंडी भाषा है ? अगर नहीं तो फिर आप लोग उसका बिरोध क्यों नहीं करते है ?
बंगला और ओडिया का विरोध करने वाले ये नेता किस मुह से विधानसभा में उर्दू शिक्षक और मदरसा शिक्षको बहाली और मदरसा अनुदान की बात करते है ?कई झारखंडी नेता जो हिंदी (दिकु भाषा ) के लिखे पोस्टर बैनर द्वारा बंगला ओडिया का विरोध कर रहे है वो विधानसभा में उर्दू मीडियम स्कूल खोलने उर्दू शिक्षको की बहाली और मदरसा अनुदान के लिए हंगामा करते है . ऐसे दोगले चरित्र के लोगो को पहचाने की जरुरत है .अपने को झारखंडी भाषा संस्कृति का हितेषी और ठेकेदार बताने वाले लोग पहले उर्दू का विरोध कर के दिखाए .
उर्दू के विषय पर सभी झारखंडी भाषा अखडा और संगठनो ने चुप्पी क्यों साध ली है क्या उर्दू झारखंडी भाषा है ?

Badal mahato , baramasia chandankiyari

Badal chandra mahato said...

बिहार सरकार में मैथिलि भासा की उपेछा कर के उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभासा बना दिया , झारखण्ड में भी बांग्ला भासा की उपेछा कर उर्दू को द्वितीय राजभासा बना दिया . उर्दू का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध है , क्या कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध है ,नहीं बिलकुल नहीं , भला अरबी फारसी और तुर्की सब्दो वाली उर्दू भासा का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध हो सकता है . झारखण्ड की राजकीय भासा हिंदी खुद एक आयातित भासा है जिसे उत्तर प्रदेश से आयात किया गया है
आज हिंदी झारखण्ड की राजभासा है परन्तु झारखण्ड में हिंदी भासा का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है. हिंदी भासा का आगमन झारखण्ड में १०० बरस पूर्व हुआ . आज भी झारखण्ड के दुर-दराज ग्रामीण अँचल में लोग हिंदी भासा बोलना नहीं जानते . झारखण्ड की पुरानी पीड़ी के लोग हिंदी बोलना नहीं जानते . आजकल दूरदर्सन हिंदी फिल्मो ,केबल टीवी ,रेडिओ की वजह से लोग हिंदी बोलना सीख गए है . युवा पीड़ी हिंदी में बात करना पसंद करती है
परन्तु झारखंडी लोगो की मात्रभासा हिंदी नहीं है. सरकारी कम काज के लिए झारखंडी भाषाये उपयुक्त नहीं है इसलिए हिंदी को राजभासा बनाया गया . झारखण्ड में रह रहे १ करोड़ बिहारी लोग हिंदी बोलते है इसलिए हिंदी को राजभासा बनाया गया .
झारखण्ड में बंगला भासा का इतिहास और झारखंडी संस्कृति पर बंगला भासा का प्रभाव -
बंगला भासा करीब २००० बरस पुरानी भासा है . हिंदी अपेछाकृत नयी भासा हिंदी भासा का विकाश पछिम उत्तर प्रदेश प्रदेश की खरी बोली से हुआ तथा अवधि ब्रज इसके अंग है .
मैथिलि बंगला की जन्मदाता भासा है . बंगला वास्तव में मैथिलि और अंगिका भासा का पूर्वी रूपांतरण है. अंगिका और मैथिलि के साथ बंगला का घनिष्ट सम्बन्ध है .बंगला भासा की लिपि वास्तव में मैथिलि लिपि से ली गयी है जिसे तिरहुता या मिथिलाखर कहते है . बंगला की खुद की कोई लिपि नहीं है .बंगला तिरहुता या मिथिला लिपि को प्रोयोग में लाता है. बंगला भासा का इतिहास झारखण्ड में १०००० बरस पुराना है या उससे भी पुराना .प्राचीन काल
झारखण्ड में बंगाल के पाल वंश का सासन था . सन १९१२ तक झारखण्ड बंगाल प्रसिदेंसी का भाग था.
झारखण्ड के बंगला भासी प्रदेश -

Dr. Dhanakar Thakur said...

aapke comments ke liye dhanyavad.
Ham bahut pahlese hee Urdu ko Biharki doosraee rajbhasha ke jagah maithilee ko banaye jane kee mang karte rahe hain kyonki Mithilaka musalaman Maithili bolta hai.

Badal chandra mahato said...

chas chandandankiyari me maithil brahman ke 70-80 gao hai jo 200-300 sal pahle akar base hai lekin ab wo log khortha aur bangla bolte hai.
manbhum ilaki ki official bhasha bangla hi thi.lekin jharkhand ke boarder ke log mix khortha kudmali jise mota bangla bolte hai jo pure bangla se kuch alag hai. maithili bhashiyo ne apni lipi mithilakshar ko kyo chod diya?

Badal chandra mahato said...

भाषा के विकाश के लिए राजकीय संरक्षण जरूरी है . हिंदी भासा को रास्त्रभाषा का दर्जा मिलने से हिंदी का विकाश हुआ और पुरे भारत में फैली. हिंदी भाषा का विकाश पश्चिम उत्तर प्रदेश की खरी बोली से हुआ .मुग़ल कल के फारसी राजभाषा थी और बाद में फारसी के अधर पर उर्दू का विकाश हुआ . उर्दू का विकाश कल १५ वी १६ वी और १७वि सताब्दी रहा है . १७ वी सदी उर्दू अपने आधुनिक रूप में प्रकट हुई ये केवल मुसलमानों के उच्च वर्ग की भाषा थी .खाश तोर पर जो भारतीय मुस्लमान
तुर्की ईरानी अरबी अफगान वंसज थे या मुसलमानों के अभिजय वर्ग के भाषा थी . ये गाव देहात में रहने वाले हिन्दू से धर्मान्तरित मुसलमानों की भाषा नहीं थी . मुसलमानों का ९०% हिन्दू से धर्मान्तरित मुसलमानों का था और वोह स्थानीय देसज भाषाए ही बोलती थी . बाद में मुस्लिम राष्ट्रवाद के फेलाव के चलते बाकि मुस्लमान भी उर्दू के प्रभाव में आ गए .लेकिन १८ वी सताब्दी तक ये केवल शहरी अभिजात्य उच्च वर्गीय सेख सय्यद मुग़ल पठान मुसलमानों की भाषा ही बनी रही . उत्तर भारत के ग्रामीण मुसलमानों पर उर्दू का बिलकुल भी प्रभाव नहीं पड़ा था .गाव में रहने वाले अंसारी और जुलाहे भाषा के मामले पूरी तरह से भोजपुरी अवधी बुन्देलखंडी,खड़ी बोली , ब्रजभाषा पर आधारित थे . बाद में ब्रिटिश राज में अंग्रोजो ने उर्दू बहुत बढावा दिया .ब्रिटिश राज में मुस्लिम राष्ट्रवादियो ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया .
हिंदी और उर्दू का विवाद बढता चला गया जिसकी परिणिति देश के विभाजन के रूप में आई .
कांग्रेस और गाँधी जी ने बीच का रास्ता हिन्दुस्तानी भाषा के रूप में सुझाया . हिन्दुस्तानी हिंदी और उर्दू की मिश्रित भाषा थी . गाँधी जी ने सुझाव दिया की देवनागरी लिपि को अपनाया जाय और उर्दू सब्दो को स्वीकार किया जाय और हिन्दू और उर्दू के मिश्रित रूप हिन्दुस्तानी की ही अभिभाजित भारत की रास्त्र भाषा बनाया जाय . परन्तु मुस्लिम लीग उर्दू को रास्त्रभाषा बनाने पर अड़ी रही जिसका परिणाम देश का भिभाजन के रूप आया और उर्दू को पाकिस्तान की रास्त्रभाषा बनाया गया है .
भारत में भी उर्दू – जम्मू कश्मीर , झारखण्ड दिल्ली आंध्र वेस्ट बंगाल , बिहार उत्तर प्रदेश में राजकीय भाषाहै उर्दू भाषा का मुद्दा मुस्लिम वोट बैंक पोलिटिक्स से जुड़े गयी है . हर राजनितिक दल उर्दू के विकाश की बात करता है . कांग्रेस तो तुस्टीकरण की राजनीती करती ही है अन्य दल भी अपने राज्यों में उर्दू मीडियम स्कूल खोल रहे है और उर्दू को बढावा दे रहे है . भारत के हर राज्य में मुसल्माओ के लिए अलग मदरसा बोर्ड है .हैदराबाद में रास्ट्रीय उर्दू विश्वविदालय बनायीं गयी है .
मुसलमानों द्वारा हिंदी भाषा का बहिस्कार -
भारत में एक सामानांतर शिक्षा व्यवस्था चल रही है . उत्तर प्रदेश बिहार झारखण्ड , मद्यप्रदेश ,आदि राज्यों में हिंदी मीडियम स्कूल के बगल में उर्दू मीडियम स्कूल चल रहे है .क्या उत्तर भारत के मुसलमान हिंदी पड़ना लिखना नहीं जानते है ? तो फिर से अलग उर्दू मीडियम स्कूल की जरुरत क्यों पढ़ी क्या ये मुस्लमान की अलगावादी सोच का प्रतिक नहीं है?
क्या धरम बदलने से भाषा भी बदल जाती है ?झारखण्ड में मुसलमानों का उर्दू से क्या सम्बन्ध है ?झारखंडी के मुस्लमान झारखंडी मूल्निवाशी सदान है तथा आदिवाशी संथाल कुड्मी तेली कुम्हार मुंडा और अन्य झारखंडी जातयो के धर्मान्तरित होने से बने है . और उनका उर्दू भाषी उत्तर प्रदेश के मुसल्माओ से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है . झारखंडी मुस्लमान ठेठ झारखंडी रहे रहे और झारखंडी भासये खोरठा , पंचापर्गानिया , नागपुरी , कुड्माली और झारखंडी मोटा बंगला बोलते रहे है .
भला अरबी , फारसी और तुर्की सब्दो से बनी उर्दू का भला झाढ़ंद से क्या सम्बन्ध हो सकता है ?
फ्रीर क्यों उर्दू को झारखंडी की द्वितीय राजभाषा बनाया गया , क्या उर्दू एक झारखंडी भाषा है या उर्दू का झारखण्ड से कोई सांस्कृतिक या इतिहासिक सम्बन्ध है ? नहीं बिलकुल नहीं उर्दू का झारखण्ड से कोई सम्बन्ध नहीं है .

The Maithil Guy said...

hindi ko to bihar ka bhi language nhi hona chahiye...but it is all language politics.....aaj kal ka kya.previous generation b full to hindi k apna chuka hain....politically jab tak apna language and script ko impose nhi kiya jayega tab tak maithili ka yehi haal rahga and who knows in years to come shayad khatam bhi ho jayega.
dusri sab se badi problem hain bhojpuri jo ki maithili par haavi hote jaa rhi h n "bihar" govt support bhi karti h. thus ultimately maithili identity is getting tarnished..

Dr. Dhanakar Thakur said...

आपकी बात बहुत हद तक सही है